हिन्दी दोहे

*विद्या*
 
विद्या विमल वसुंधरा,वासर वर व्यवहार।
व्यापक विजय वरीयता,सुन्दर सुखद विचार।।

शिक्षा रत्न अमूल्य है,सृष्टि का है सार।
गहराई जितनी मिले, निकले उतनी धार।।

शिक्षा अचल है संपदा ,खर्च में गुणज होय।
जो इसको अर्जित करे,पार न पावे कोय।।

शिक्षा प्रगति का मूल है,अज्ञानता हो दूर। 
मूरख किस्मत दोष दे, खोजे लाख कसूर।।

विद्या की जब आस हो, बाढ़े शुद्ध विचार।
अपनी मेहनत का सदा,है बढ़िया उपहार।।

अनुशासन में नित रहे,विद्या की हो आस।
मन मंदिर विद्या भरे,होवे चहूँ विकास।।

विद्या धन का स्रोत है,करे सदा अभ्यास।
अज्ञानता छूवे नही, उजियारा हो पास।।

मन को जो शीतल करे, ज्ञान का हो भंडार।
विद्या से गुणवान हो, करे विश्व संचार।।

शिक्षा ब्यापक है सखे , सीमा अनंत अछेद।
देखो वैदिक काल से, अभिन्न बखाने वेद।।

नैन खुले जब प्रात को,देना शुद्ध विचार।
हम बच्चों की आस को,करना प्रभु साकार।।

सदा नियम से हम बंधे,जग के पालन हार।
 उर आलोकित कीजिए, हो विद्या विस्तार ।।

        *ज्वाला विष्णु कश्यप*

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