छ.ग.कविता

छत्तीसगढ़ी कविता
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धरती के छाती म जनम ले हँव,
मोर भार ह एला हरू हावय।
ए करिया बादर बता ना, 
तोला काबर  गरू  हावय।।
-करथे ए हमला दुलार,
दे हावय जग ला जनम।
का जानबे तै बाँझ बैरी,
का होथे जचकी के मरम।।
बरसावत हावच तै पथरा,
मोर मेर कलप तरू हावय।।ए करिया.....
-धरती मईया दुःख सकेले,
बइठे हे मया के आस मा।
तोड़क पद पाके बैरी,
उड़त हवच अकास मा।
सागर कस एखर मया हे,
तोर मेर एक चरू हावय।।ए करिया....
अभी तो उड़त हच अधर मा,
एक दिन समाबे छाती मा।
धरती मईया भेद न मानय,
अमरित रखे हे तोर बर थाथी मा।।
सब ल देखे ए मीठ चारा,
तोर बर काबर खरु हावय।।ए करिया....
             ज्वाला प्रसाद कश्यप
                  (शिक्षक L.B.)
      शा.पू.माध्य.शाला-झझपुरी खुर्द
          भठली कला ,मुंगेली छ.ग.
                   8770734890

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