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होली पर दोहे

      होली के इस पर्व में  होली के इस पर्व में,चलो करें दो काम। पेड़ कटाई रोक कर,दें खुशियाँ पैगाम।। उस माता से पूछिए,क्या है रंग ग़ुलाल। बेटा जिसने खो दिया, सरहद में इस साल।। होली ने अवसर दिए,चलो भूलें हम बैर। बच्चों को हम स्नेह दें, बड़ों के छूँले पैर।। जाति-धर्म के आग में,धधक रहा संसार।  प्रेम-भाव के मंत्र से,भर दें सकल दरार।।  होली पावन प्रेम से, चलो मिलाएं हाथ।  दो दिन की है जिंदगी, क्या जाएगा साथ।। रंगों के त्यौहार में,खोज रहा हूँ रंग। पानी में जो ना धुले,रहे उमर भर संग।। चलो जलाएं होलिका,डालें दोष विकार। बैर न आवे पास मे, यही पर्व का सार।।        ज्वाला प्रसाद कश्यप

छत्तीसगढ़ी दोहे (ज्वाला विष्णु कश्यप )

*पेड़* आमा अमली आँवला, अंगूर अउ अनार। फर माते हे पेड़ मा, नव गे हावय डार।। उजड़े जंगल देख के, मन हा हवय उदास। कहाँ गए सब पेंड़ मन, साजा नीम पलास।। मनखे अपने हाथ मा, रोज बलाथे काल। पेड़ लगाए छोड़ के, काटत हे हर साल।। हर्रा बहेरा आँवरा, बर पीपर अउ जाम । पेड़ नही सब देव ए, करे दवाई काम।। कहाँ गँवागे बाँस हर, दिखय जेन घनघोर। कदम साल अऊ लीम के, कोन बतावय सोर।। जंगल झाड़ी हर सखा, आए धाम समान पेड़ जड़ी के रूप मा, करथे रोग निदान ॥ चंपा केवरा मोंगरा, दसमन हे छतनार। लाल गुलाबी खोखमा, रिगबिग दिखे मदार।। नीत नही हे गाँव मा, सतजन रहे उदास। अइसे गाँव ला छोड़ के, कर लेहव बनवास।। .        *ज्वाला विष्णु कश्यप*       

हिन्दी दोहे

*विद्या*   विद्या विमल वसुंधरा,वासर वर व्यवहार। व्यापक विजय वरीयता,सुन्दर सुखद विचार।। शिक्षा रत्न अमूल्य है,सृष्टि का है सार। गहराई जितनी मिले, निकले उतनी धार।। शिक्षा अचल है संपदा ,खर्च में गुणज होय। जो इसको अर्जित करे,पार न पावे कोय।। शिक्षा प्रगति का मूल है,अज्ञानता हो दूर।  मूरख किस्मत दोष दे, खोजे लाख कसूर।। विद्या की जब आस हो, बाढ़े शुद्ध विचार। अपनी मेहनत का सदा,है बढ़िया उपहार।। अनुशासन में नित रहे,विद्या की हो आस। मन मंदिर विद्या भरे,होवे चहूँ विकास।। विद्या धन का स्रोत है,करे सदा अभ्यास। अज्ञानता छूवे नही, उजियारा हो पास।। मन को जो शीतल करे, ज्ञान का हो भंडार। विद्या से गुणवान हो, करे विश्व संचार।। शिक्षा ब्यापक है सखे , सीमा अनंत अछेद। देखो वैदिक काल से, अभिन्न बखाने वेद।। नैन खुले जब प्रात को,देना शुद्ध विचार। हम बच्चों की आस को,करना प्रभु साकार।। सदा नियम से हम बंधे,जग के पालन हार।  उर आलोकित कीजिए, हो विद्या विस्तार ।।         *ज्वाला विष्णु कश्यप*

हिन्दी दोहे

                विद्या  .           ज्वाला विष्णु कश्यप     विद्या विमल वसुंधरा,वासर वर व्यवहार। व्यापक विजय वरीयता,सुन्दर सुखद विचार।। शिक्षा रत्न अमूल्य है,सृष्टि का है सार। गहराई जितनी मिले, निकले उतनी धार।। शिक्षा अचल है संपदा ,खर्च में गुणज होय। जो इसको अर्जित करे,पार न पावे कोय।। शिक्षा प्रगति का मूल है,अज्ञानता हो दूर।  मूरख किस्मत दोष दे, खोजे लाख कसूर।। विद्या की जब आस हो, बाढ़े शुद्ध विचार। अपनी मेहनत का सदा,है बढ़िया उपहार।। अनुशासन में नित रहे,विद्या की हो आस। मन मंदिर विद्या भरे,होवे चहूँ विकास।। विद्या धन का स्रोत है,करे सदा अभ्यास। अज्ञानता छूवे नही, उजियारा हो पास।। मन को जो शीतल करे, ज्ञान का हो भंडार। विद्या से गुणवान हो, करे विश्व संचार।। शिक्षा ब्यापक है सखे , सीमा अनंत अछेद। देखो वैदिक काल से, अभिन्न बखाने वेद।। नैन खुले जब प्रात को,देना शुद्ध विचार। हम बच्चों की आस को,करना प्रभु साकार।। सदा नियम से हम बंधे,जग के पालन हार।  उर आलोकित कीजिए, हो विद्या विस्तार ।।   ...

विद्या पर दोहे

*मौलिक दोहा छंद*   *सर्वाधिकार  सुरक्षित@* विद्या विमल वसुंधरा,वासर वर व्यवहार। व्यापक विजय वरीयता,सुन्दर सुखद विचार।। शिक्षा रत्न अमूल्य है,सृष्टि का है सार। गहराई जितनी मिले, निकले उतनी धार।। शिक्षा अचल है संपदा ,खर्च में गुणज होय। जो इसको अर्जित करे,पार न पावे कोय।। शिक्षा प्रगति का मूल है,अज्ञानता हो दूर।  मूरख किश्मत दोष दे, खोजे लाख कसूर।। विद्या की जब आस हो, बाढ़े शुद्ध विचार। अपनी मेहनत का सदा,है बढ़िया उपहार।। अनुशासन में नित रहे,विद्या की हो आस। मन मंदिर विद्या भरे,होवे चहूँ विकास।। विद्या धन का स्रोत है,करे सदा अभ्यास। अज्ञानता छूवे नही, उजियारा हो पास।। मन को जो शीतल करे, ज्ञान का हो भंडार। विद्या से गुणवान हो, करे विश्व संचार।। शिक्षा ब्यापक है सखे , सीमा अनंत अछेद। देखो वैदिक काल से, अभिन्न बखाने वेद।। नैन खुले जब प्रात को,देना शुद्ध विचार। हम बच्चों की आस को,करना प्रभु साकार।। सदा नियम से हम बँधें,जग के पालन हार।  उर आलोकित कीजिए, हो विद्या विस्तार ।।         ज्वाला कश्यप  शा.पू.माध्य.शाला झझपुरी खुर्द      ...

दोहे 2

*दोहे* ज्ञान बिना संसार ला, कोरा कागज जान। जतका इहाँ बटोर ले, बरसत हावय ज्ञान।।(1) मत मारव पर जीव ला, सबला एके जान। पूरा ए संसार ला, गढ़े हवय भगवान।।(2) भाई भाई के देंह मा, हावय एके खून। धन दौलत के आड़ मा, तन ला खागे हून।।(3) देख देख पर दोष ला, बितगे कतको साल। अइसे आदत ला तहूँ,मनले अपन निकाल।।(4) अपने दोष दिखे कहाँ,पर के दिखे हजार। जिनगी हावय कीमती,जेला झन ना बार।।(5)  बदला ले के भावना,ला करदे तै दूर। सजा देहि श्री राम हा, जेखर हवय कसूर।।(6) दूध म पानी झन मिला,छँटहि एक दिन फेर। इहाँ गवाही राम हे,होय नही अंधेर।।(7) अपने दुःख के सही,पर के दुःख तै जान। सबला जाना हे कभू,समय हवय बलवान।।(8) सांस सांस हे कीमती,करव सही उपयोग। रुक जाही कब हे पता,ताकत हावय रोग।।(9) कोन अकेला हे भला,कोनो हावय संग। ओला निर्बल जान के,झन करबे तै तंग।।(10) अदला बदला हे इहाँ,हवय समय के फेर। होथे सही नियाँव हा, मिलथे सांझ अबेर।।(11)     *ज्वाला प्रसाद कश्यप*              *(शिक्षक)*        *भठली कला ,मुंगेली*

कविता

*आज के तुलसी दास* बरसत पानी कड़कत बिजली, आधा     रात   चउमास के। रत्नावली   ह   देखिच, चाल ल तुलसी दास के।।(1) हे पति  हे स्वामी, तोर मया ह का काम के। ए नरक ले तर जाबे,  नाम लेबे त श्री राम के।।(2)  तुलसी के बुखार उतरगे, रत्ना के सुन के बोली। उमर भर के बीमारी ले, तुलसी ह पागे राम के गोली।(3) राम ल पाए बर रत्ना ह, बनगे तुलसी के गुरु। घर ले बाहिर निकल के, रामायण लिखे  करिच शुरू।(4) आज के रत्ना ह समझाथे तुलसी दास ल। धरती म बईठ के अमरथे अकास ल।।(5) रत्ना ह ठंडा होथे, तुलसी ह गरम होथे। रत्ना बर तुलसी के मन म बड़ भरम होथे।।(6) रत्ना ह थाना म करथे शिकायत पेस। तुलसी दास बर लग जाथे दहेज के केस।(7) रत्ना तुलसी दुनो झन जमाथे अब्बड़ धाक। आखिर म एक दूसर के, हो जाथे तलाक।।(8) नारी के आरक्षण ल झन समझबे खेल। ओ तुलसी ह राम ल पागे तोला भेजत हाँवव जेल।।(09) जेल घर के आगी म, चाउर दार सही चुरबे। ओ समय के तुलसी म अरे पगला तैहा कहाँ पुरबे।।(10)        *ज्वाला प्रसाद कश्यप*         *भठली कला(मुंगेली)*   ...