छत्तीसगढ़ी दोहे (ज्वाला विष्णु कश्यप )
*पेड़* आमा अमली आँवला, अंगूर अउ अनार। फर माते हे पेड़ मा, नव गे हावय डार।। उजड़े जंगल देख के, मन हा हवय उदास। कहाँ गए सब पेंड़ मन, साजा नीम पलास।। मनखे अपने हाथ मा, रोज बलाथे काल। पेड़ लगाए छोड़ के, काटत हे हर साल।। हर्रा बहेरा आँवरा, बर पीपर अउ जाम । पेड़ नही सब देव ए, करे दवाई काम।। कहाँ गँवागे बाँस हर, दिखय जेन घनघोर। कदम साल अऊ लीम के, कोन बतावय सोर।। जंगल झाड़ी हर सखा, आए धाम समान पेड़ जड़ी के रूप मा, करथे रोग निदान ॥ चंपा केवरा मोंगरा, दसमन हे छतनार। लाल गुलाबी खोखमा, रिगबिग दिखे मदार।। नीत नही हे गाँव मा, सतजन रहे उदास। अइसे गाँव ला छोड़ के, कर लेहव बनवास।। . *ज्वाला विष्णु कश्यप*