छत्तीसगढ़ी कविता

* ओखरे शरण मा *
ओखरे शरण मा जाके पूछव,
जेन ह जग ला पालत हे।
मोर तीर झन आके पूछव,
काबर धरती हालत हे।।
टोपा बांध के बइठे हे,
लूको के अपन आँखी ।
सब के करनी कहाँ जाही,
हावय सुरुज ह साखी।।
अपन बर तो फूल के रस्ता,
दूसर बर धरती ला उछालत हे।। (01)मोर तीर....
सब के आघू म रोवत हावय,
ढरकावत हे आंसू।
ओही थारी के छेद करत हे,
जाके परदा के पासू।।
आंसू ल देख के दुःख बिसरागे हमर.
कहत हन हमला ओमन तारत हे।।(02)मोर तीर....
पापी संग म धरमी घलो मन,
हो जाथे पाप के भागी।
सबला एक दिन जलना परही,
जब धरती उगलही आगी।।
दाना बदरा के होही चिन्हारी,
ऊपर वाले चन्नी धर के चालत हे।।(03) मोर तीर.....
   
    . *ज्वाला प्रसाद कश्यप*
     शास.पूर्व माध्य.शाला-झझपुरी खुर्द मुंगेली (छ.ग.)
                8770734890

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